ढलान से उतरते हुए




कुछ महीने बड़े ही तरतीब से बीते जैसे फूलों को खिलते हुए देखने के लिए कोई जागा करे. मैंने भी कुछ ही क्षणों को मुरझाते हुए देखा बाकी तो व्यस्तताओं की भेंट चढ़ गए. इधर मौसम में थोड़ी ठंडक आई तो बीते कई सालों के टूटे फूटे चहरे याद आए।


एक संक्षिप्त सी कविता



तुम्हारी हथेलियों की गंध
जो मेरी रूह में समाई थी
अब भी फैली होगी हवा में कहीं.
बाहों का पसीना
महकता होगा सरसों के खेत सा
आवाज़ के कुछ टुकड़े
बिखरे होंगे सूखे पत्तों में,
जाने क्यों सोचती हूँ ऐसा
और क्यों बची रहती है उम्मीदें
बाद मुद्दत के, कहीं न कहीं.
मैं जब भी उतरती हूँ
सुंदर, ऊँचे पेड़ों से भरी वादी की ढ़लान
अपने कांधों पर पाती हूँ
एक बेजान अहसास,
गोया पेड़ से पत्तों की जगह
दम तोड़ चुकी इच्छाएं झरती हों.

दो कवितायें बिना शीर्षक के

एक :

नन्ही परियां
उड़ती है तितलियों सी
किसी के हाथ ना आने को,
लड़के भरते हैं कुलांचें
जंगल के ओर छोर को
नापने की जिद में।
झुरमुट की आड़ में युवा
थामता है हाथ,
टटोलता है प्रेम का घनत्व।
युवती सूंघती हैं साँसें
स्त्रीखोर की
मामूली पहचान को परखने के लिए।
बूढे कोसते हैं समय को
और लौट लौट आते हैं
पार्क की उसी पुरानी बेंच पर
जिसका एक पाया,
उन्होंने कभी देखा ही न था।


दो :

बादल निगल जाते हैं जब
आकाश की ज्यामितीय रचना को
सितारों को ढक लेती है
भूरे रंग की बेहया जिद्दी धूल
तब भी दिखाई देती है
झुर्रियों वाली बुढ़िया
आदिम युगों से आज तक
कातती हुई समय का सूत।



एस्केलेटर




मंतव्य
तुम्हारे दांतों का सफ़ेद रंग
महज एक विज्ञापन होता है
या फ़िर
ये कोई और मंतव्य ढोता है।


क्रेच
सभ्य शालीन निपुण
पच्चीस साला युवती वाला क्रेच
बच्चों के लिए अच्छा होता है
हालाँकि केयर टेकर का बच्चा
घर में चारपाई से बंधा
रस्सी से खेलता और रोता है।


एस्केलेटर
तपती दुपहरी में
गली से गुजरे युवक को
पहली नज़र में प्यार होता है
जबकि नवयौवना के साथ
हर रात मोतियाबिंद
लाचारी और
माँ का बुढापा सोता है।



वर्तुल जीवन नही होता सिर्फ़ सुख और दुःख होते हैं जो उम्र भर एक दूसरे के पीछे भागते रहते हैं, प्यार को पाने दौड़ो तो पागल कहलाओ चुप बैठो तो सौदाई.... उसे नींद आती है मुझे देख कर और मेरी नींद उड़ जाती है उसको देख कर। जरूरी नहीं है ज़िन्दगी को दर्शन की तरह देखा जाए, कैसे भी देखो इसे बीत ही जाना है.

ऐसे सवालों ने दिमाग में दम कर रखा है



कुछ नोट्स जिन्हें कविता कहा जा सकता है.




एक :
व्यवस्था के साथ
चली आती हैं विडम्बनाएँ
जैसे तुम्हारे साथ
निर्लजता ।

दो:
बाढ़ की त्रासदी के साथ
बह कर आती है नई मिट्टी
जैसे तुमपे रो लेने के बाद
देखती हूँ , दुनिया और भी है ।

तीन:
कई बार भेड़ें
स्वयं कटने को होती है प्रस्तुत
जैसे तुम्हारा फोन
उठा लेती हूँ कभी-कभी ।

चार:
ज्यादातर घटनाएँ
इतिहास में नहीं की जाती दर्ज
जैसे कालजयी है
नारी का रुदन।

पाँच:
सब नपुंसक
लिंग के कारण नहीं होते
जैसे कुछ पैदा होते हैं
अवीर्य आत्मा के साथ।


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